अटल बिहारी वाजपेयी, ये वो नाम है जिसको आज पूरा देश जानता है। अटल बिहारी वाजपेयी जी न सिर्फ एक अच्छे नेता थे बल्कि वे एक बहुत अच्छे कवि भी थे। अटल जी को एक अच्छे कवि के रूप में भी पूरे भारत में याद किया जाता है। हम अपने इस आर्टिकल में अटल बिहारी वाजपेयी की कविता आप तक पहुंचा रहे हैं। यहां से पढ़ें Atal Bihari Vajpayee Poem in Hindi.

  1. हरी हरी दूब पर

हरी हरी दूब पर
ओस की बूंदे
अभी थी,
अभी नहीं हैं|
ऐसी खुशियाँ
जो हमेशा हमारा साथ दें
कभी नहीं थी,
कहीं नहीं हैं|

क्काँयर की कोख से
फूटा बाल सूर्य,
जब पूरब की गोद में
पाँव फैलाने लगा,
तो मेरी बगीची का
पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा,
मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ
या उसके ताप से भाप बनी,
ओस की बुँदों को ढूंढूँ?

सूर्य एक सत्य है
जिसे झुठलाया नहीं जा सकता
मगर ओस भी तो एक सच्चाई है
यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है
क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊँ?
कण-कण मेँ बिखरे सौन्दर्य को पिऊँ?

सूर्य तो फिर भी उगेगा,
धूप तो फिर भी खिलेगी,
लेकिन मेरी बगीची की
हरी-हरी दूब पर,
ओस की बूंद
हर मौसम में नहीं मिलेगी।

– अटल बिहारी वाजपेयी

बेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूं
गीत नहीं गाता हूं

लगी कुछ ऐसी नज़र बिखरा शीशे सा शहर
अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं
गीत नहीं गाता हूं

पीठ मे छुरी सा चांद, राहू गया रेखा फांद
मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूं
गीत नहीं गाता हूं

-दूसरी अनुभूति

2. गीत नया गाता हूं

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात कोयल की कुहुक रात

प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूं
गीत नया गाता हूं

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा,

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं

3. मौत से ठन गई! 

ठन गई!

मौत से ठन गई!

मौत से ठन गई!

ठन गई!

मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,

मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,

यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,

ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,

लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,

सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,

शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,

दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,

न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,

आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,

नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,

देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

4. आज़ादी अभी अधूरी है 

पन्द्रह अगस्त का दिन कहता – आज़ादी अभी अधूरी है।

सपने सच होने बाक़ी हैं, राखी की शपथ न पूरी है॥

जिनकी लाशों पर पग धर कर आजादी भारत में आई।

वे अब तक हैं खानाबदोश ग़म की काली बदली छाई॥

कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आंधी-पानी सहते हैं।

उनसे पूछो, पन्द्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं॥

हिन्दू के नाते उनका दुख सुनते यदि तुम्हें लाज आती।

तो सीमा के उस पार चलो सभ्यता जहाँ कुचली जाती॥

इंसान जहाँ बेचा जाता, ईमान ख़रीदा जाता है।

इस्लाम सिसकियाँ भरता है,डालर मन में मुस्काता है॥

भूखों को गोली नंगों को हथियार पिन्हाए जाते हैं।

सूखे कण्ठों से जेहादी नारे लगवाए जाते हैं॥

लाहौर, कराची, ढाका पर मातम की है काली छाया।

पख़्तूनों पर, गिलगित पर है ग़मगीन ग़ुलामी का साया॥

बस इसीलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी है।

कैसे उल्लास मनाऊँ मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥

दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएँगे।

गिलगित से गारो पर्वत तक आजादी पर्व मनाएँगे॥

उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें।

जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें॥

वे हमेशा अपने भाषणों में अपनी कविताएं सुनाया करते थे। अटल भारत में दक्षिणपंथी राजनीति के उदारवादी चेहरा रहे और एक लोकप्रिय जन नेता के तौर पर पहचाने गए।

5. कदम मिलकर चलना होगा  

बाधाएँ आती हैं आएँ

घिरें प्रलय की घोर घटाएँ

पावों के नीचे अंगारे

सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ

निज हाथों में हँसते-हँसते

आग लगाकर जलना होगा

कदम मिलाकर चलना होगा

हास्य-रुदन में, तूफानों में

अगर असंख्यक बलिदानों में

उद्यानों में, वीरानों में

अपमानों में, सम्मानों में

उन्नत मस्तक, उभरा सीना

पीड़ाओं में पलना होगा

कदम मिलाकर चलना होगा

उजियारे में, अंधकार में

कल कहार में, बीच धार में

घोर घृणा में, पूत प्यार में

क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में

जीवन के शत-शत आकर्षक

अरमानों को ढलना होगा

कदम मिलाकर चलना होगा

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ

प्रगति चिरंतन कैसा इति अब

सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ

असफल, सफल समान मनोरथ

सब कुछ देकर कुछ न माँगते

पावस बनकर ढ़लना होगा।

कदम मिलाकर चलना होगा।

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,

प्रखर प्यार से वंचित यौवन,

नीरवता से मुखरित मधुबन,

परहित अर्पित अपना तन-मन,

जीवन को शत-शत आहुति में,

जलना होगा, गलना होगा।

कदम मिलाकर चलना होगा।

आज हम आपको बता रहे हैं उनके द्वारा लिखी हुई चुनिंदा कविता संग्रह के बारे में, जिन्हें आप जरूर पढ़ना चाहेंगे।

6. हिन्दू तन मन, हिन्दू जीवन 

हिन्दू तन–मन, हिन्दू जीवन, रग–रग हिन्दू मेरा परिचय!

मै शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार–क्षार।

डमरू की वह प्रलय–ध्वनि हूँ, जिसमे नचता भीषण संहार।

रणचंडी की अतृप्त प्यास, मै दुर्गा का उन्मत्त हास।

मै यम की प्रलयंकर पुकार, जलते मरघट का धुँआधार।

फिर अंतरतम की ज्वाला से जगती मे आग लगा दूँ मैं।

यदि धधक उठे जल, थल, अंबर, जड चेतन तो कैसा विस्मय?

हिन्दू तन–मन, हिन्दू जीवन, रग–रग हिन्दू मेरा परिचय!

मैं अखिल विश्व का गुरु महान्, देता विद्या का अमरदान।

मैने दिखलाया मुक्तिमार्ग, मैने सिखलाया ब्रह्मज्ञान।

मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर।

मानव के मन का अंधकार, क्या कभी सामने सका ठहर?

मेरा स्वर्णभ मे घहर–घहर, सागर के जल मे छहर–छहर।

इस कोने से उस कोने तक, कर सकता जगती सोराभ्मय।

हिन्दू तन–मन, हिन्दू जीवन, रग–रग हिन्दू मेरा परिचय!

मैने छाती का लहू पिला, पाले विदेश के क्षुधित लाल।

मुझको मानव में भेद नही, मेरा अन्तस्थल वर विशाल।

जग से ठुकराए लोगों को लो मेरे घर का खुला द्वार।

अपना सब कुछ हूँ लुटा चुका, फिर भी अक्षय है धनागार।

मेरा हीरा पाकर ज्योतित परकीयों का वह राजमुकुट।

यदि इन चरणों पर झुक जाए कल वह किरीट तो क्या विस्मय?

हिन्दू तन–मन, हिन्दू जीवन, रग–रग हिन्दू मेरा परिचय!

होकर स्वतन्त्र मैने कब चाहा है कर लूँ सब को गुलाम?

मैने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम।

गोपाल–राम के नामों पर कब मैने अत्याचार किया?

कब दुनिया को हिन्दू करने घर–घर मे नरसंहार किया?

कोई बतलाए काबुल मे जाकर कितनी मस्जिद तोडी?

भूभाग नहीं, शत–शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय।

हिन्दू तन–मन, हिन्दू जीवन, रग–रग हिन्दू मेरा परिचय!

मै एक बिन्दु परिपूर्ण सिन्धु है यह मेरा हिन्दु समाज।

मेरा इसका संबन्ध अमर, मैं व्यक्ति और यह है समाज।

इससे मैने पाया तन–मन, इससे मैने पाया जीवन।

मेरा तो बस कर्तव्य यही, कर दू सब कुछ इसके अर्पण।

मै तो समाज की थाति हूँ, मै तो समाज का हूं सेवक।

मै तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय।

हिन्दू तन–मन, हिन्दू जीवन, रग–रग हिन्दू मेरा परिचय!

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