जो उम्मीदवार विदेश में रह कर मेडिकल के क्षेत्र में शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं, उन छात्रों को भी राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) के लिए अर्हता प्राप्त करनी होगी। सरकार ने नीट परीक्षा उत्तीर्ण करना इसलिए अनिवार्य किया है ताकि भविष्य में योग्य डॉक्टर तैयार किये जा सके।

विदेश में मेडिकल पढ़ने के लिए नीट पास करना हुआ ज़रूरी।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने बीते मंगलवार को भारत के स्क्रीनिंग टेस्ट विनियम (2002) में संशोधन किया। भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) द्वारा नियमों में बदलाव करने का प्रस्ताव दिया गया था।

वर्तमान में, भारत के बाहर स्थित विश्वविद्यालयों में अपनी प्राथमिक चिकित्सा योग्यता प्राप्त करने वाले छात्रों को उस देश में अभ्यास करने के योग्य होने के लिए विदेशी मेडिकल स्नातक परीक्षा (एफएमजीई) पास करना होता है। अब, उन्हें देश छोड़ने के लिए भी एक परीक्षा देनी होगी।

मिनिस्ट्री के बयान के अनुसार “इसका कारण यह है कि विदेशी संस्थानों के मेडिकल संस्थानों / विश्वविद्यालयों ने भारतीय छात्रों को उचित मूल्यांकन या छात्रों की शैक्षणिक योग्यता के बिना मेडिकल शिक्षा के लिए प्रवेश दे देना है, जिसके परिणामस्वरूप कई छात्र स्क्रीनिंग टेस्ट पास करने में विफल हो जाते हैं।”

हर साल लगभग 7,000 छात्र भारत से बाहर मेडिकल पढ़ने के लिए जाते हैं। उनमे से अधिकांश छात्र चीन और रूस में जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, 2014-15 में एफजीएम में भाग लेने वाले सभी छात्रों में से केवल 19 प्रतिशत छात्रों ने ही परीक्षा उत्तीर्ण की थी।

अधिकारियों के मुताबिक, जो छात्र परीक्षाओं को पास करने में विफल रहते हैं वे अवैध रूप से अवैधानिक अस्पताल खोल कर अभ्यास शुरू कर देते हैं, जो की ये करना खतरनाक हो सकता है। इसलिए इस कदम का लक्ष्य केवल सक्षम छात्रों को विदेशी विश्वविद्यालयों में चिकित्सा का अध्ययन करने के लिए सुनिश्चित करना है।

अब, “भारतीय नागरिक / भारत के ओवरसीज नागरिक, भारत के बाहर स्थित किसी भी चिकित्सा संस्थान से मई 2018 या उसके बाद से प्राथमिक चिकित्सा योग्यता प्राप्त करने के इच्छुक है तो उनको विदेश में एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए नीट 2018 की अर्हता प्राप्त करना ही होगा।”

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