इलाहबाद हाई कोर्ट ने यूपी शिक्षक भर्ती पर जवाब मंगा है। हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की सरकार से दिनांक 20 सितम्बर 2018 तक मांगा जवाब। यूपी शिक्षक भर्ती में कुल 68,500 पदों पर शिक्षकों की बहाली का है मामला। कोर्ट ने पूछा है कि एनसीटीई की गाइडलाइंस के उलट सरकार एक और पात्रता परीक्षा कैसे करा सकती है। याचिका में कहा गया है कि अनिवार्य शिक्षा कानून 2009 की धारा 23 के तहत केंद्र सरकार के ऐकडमिक अथॉरिटी को ही शिक्षकों की योग्यता और गाइडलाइन तय करने का अधिकार है। राज्य सरकार को गाइडलाइन बनाने और आवश्यक अर्हता तय करने का अधिकार नहीं है। बिना अधिकार के राज्य सरकार का यूपी शिक्षक भर्ती के नियमों में संशोधन करना कानूनन गलत है। एनसीटीई द्वारा निर्धारित गाइडलाइन और न्यूनतम अर्हता का पालन करना सभी राज्यों के लिए जरुरी है।

उच्च न्यायलय के लखनऊ बेंच ने कथित अनियमितताओं पर गंभीर ध्यान दिया। और सोमवार को निर्देश भी जारी किया। यूपी शिक्षक भर्ती मामले में राज्य सरकार द्वारा गठित समिति द्वारा एक जांच की जा रही है। न्यायमूर्ति इरशाद अली की पीठ ने गड़बड़ करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जानकारी भी मांगी है। अदालत ने यह भी कहा कि सभी नियुक्तियां उम्मीदवार सोनिका देवी द्वारा दायर याचिका पर पारित होने के अपने अगले आदेशों के अधीन होंगी। याचिका करता ने अपनी उत्तर पत्रिका के मूल्यांकन की मांग की है।

बता दें की यूपी शिक्षक भर्ती मामले पर एनसीटीई ने भी दिनांक 19 सितम्बर 2018 तक जवाब मंगा है। एनसीटीई का कहना है कि ऐसे अभ्यर्थी जिन्होंने शिक्षक प्रशिक्षण पूरा कर लिया हो मगर अंतिम वर्ष की परीक्षा में न बैठे हों या अंतिम वर्ष की परीक्षा में बैठ रहे अभ्यर्थी या शिक्षक प्रशिक्षण उत्तीर्ण अभ्यर्थी ही टीईटी में बैठने के लिए अर्ह हैं। इसके अनुसार बीटीसी में जो चौथे सेमेस्टर में था उसका टीईटी का प्रमाणपत्र ही मान्य है जबकि पहले, दूसरे व तीसरे सेमेस्टर में रहते हुए टीईटी पास करने वाले और उसके आधार पर नौकरी पाने वाले अभ्यर्थियों की नौकरी पर तलवार लटक रही है।

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